. भीमराव अंबेडकर की 134वीं जयंती: क्यों छोड़ा हिंदू धर्म, इस्लाम क्यों नहीं चुना, और आखिर क्यों अपनाया बौद्ध धर्म?




डॉ. भीमराव अंबेडकर की 134वीं जयंती: क्यों छोड़ा हिंदू धर्म, इस्लाम क्यों नहीं चुना, और आखिर क्यों अपनाया बौद्ध धर्म?

आज भारत रत्न डॉ. भीमराव अंबेडकर की 134वीं जयंती है। वे केवल संविधान निर्माता ही नहीं, बल्कि सामाजिक न्याय और मानवाधिकार के प्रतीक भी थे। वर्ष 1935 में, जब वे 44 वर्ष के थे, उन्होंने एक ऐतिहासिक घोषणा की – "मैं हिंदू धर्म में पैदा हुआ जरूर हूं, लेकिन हिंदू होकर मरूंगा नहीं।" इस बयान ने समाज में एक नई बहस को जन्म दिया।

अंबेडकर शुरुआत में इस्लाम धर्म की ओर आकर्षित हुए थे और उसके सिद्धांतों का उन्होंने गहन अध्ययन भी किया। लेकिन करीब दो दशकों तक विभिन्न धर्मों की तुलनात्मक समीक्षा करने के बाद, उन्होंने 1956 में नागपुर की दीक्षा भूमि पर बौद्ध धर्म को स्वीकार किया।

धर्म परिवर्तन का विचार क्यों आया?

1924 में सोलापुर में एक सार्वजनिक मंच पर अंबेडकर ने पहली बार धर्म बदलने की संभावना को सार्वजनिक रूप से रखा था। उन्होंने कहा, "जिस धर्म में इंसानियत न हो, वह किसी काम का नहीं।" यही नहीं, 3 अक्टूबर 1935 को नासिक के येवला में आयोजित एक सभा में उन्होंने स्पष्ट रूप से हिंदू धर्म त्यागने का ऐलान किया।

अपनी आत्मकथा 'वेटिंग फॉर ए वीज़ा' में उन्होंने लिखा कि उन्हें बचपन से ही अस्पृश्यता और सामाजिक भेदभाव का सामना करना पड़ा। स्कूल में उन्हें बाकी छात्रों से अलग बैठना पड़ता था, यहां तक कि पानी पीने तक के लिए उन्हें दूसरों पर निर्भर रहना पड़ता था।

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1956 में बौद्ध धर्म की राह

14 अक्टूबर 1956 को दशहरे के दिन, अंबेडकर ने नागपुर में 3.5 लाख से ज्यादा अनुयायियों के साथ बौद्ध धर्म की दीक्षा ली। महास्थविर चंद्रमणि ने उन्हें 'त्रिरत्न' की शरण में लिया। यह कदम न केवल व्यक्तिगत बदलाव था, बल्कि एक सामाजिक क्रांति की शुरुआत भी थी।

क्यों नहीं चुना इस्लाम धर्म?

अंबेडकर ने इस्लाम धर्म के सिद्धांतों को भी गंभीरता से पढ़ा और समझा। 1929 में प्रकाशित अपनी पत्रिका 'बहिष्कृत भारत' में उन्होंने लिखा था कि यदि धर्म बदलना ही है तो इस्लाम अपनाना चाहिए। उनके कई समर्थकों ने इस्लाम धर्म अपना भी लिया। लेकिन अंबेडकर को इस धर्म में भी जातीयता और बाहरी समाज के लिए अलगाव जैसे तत्व नजर आए।

उन्होंने महसूस किया कि इस्लाम में भी 'भाईचारा' केवल मुस्लिम समुदाय तक ही सीमित है, और बाकी समाज के प्रति कटुता का भाव दिखता है। अपनी किताब 'पाकिस्तान और भारत का विभाजन' में वे लिखते हैं – "इस्लाम का भाईचारा संपूर्ण मानवता के लिए नहीं, केवल मुसलमानों के लिए है।"

बौद्ध धर्म क्यों चुना?

डॉ. अंबेडकर को बौद्ध धर्म में वह मानवता, समानता और करुणा नजर आई जिसकी उन्हें तलाश थी। उन्होंने माना कि बौद्ध दर्शन न केवल आत्मिक उन्नति का मार्ग है, बल्कि सामाजिक न्याय की दिशा में भी एक ठोस कदम है।

निष्कर्ष:

डॉ. अंबेडकर का धर्म परिवर्तन कोई अचानक लिया गया फैसला नहीं था, बल्कि यह एक सोच-समझकर लिया गया सामाजिक और आध्यात्मिक निर्णय था। उनका यह कदम आज भी सामाजिक चेतना, समानता और अधिकारों की लड़ाई में एक प्रेरणा के रूप में देखा जाता है।





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